Subscribe

Subscribe To My Poems

Friday, 3 June 2022

कैसा अनोखा अलविदा


हम तो तुमपे जान देने चले थे,
हर रोज़ थोड़ा थोड़ा ज़हर भी पी लेते थे,
थकान कभी दिल की, तो कभी दिमाग की थी,
कभी बे दिशा भागादौड़ी की थी 

हम तो तुमपे जान देने निकले थे
हर शाम ढलते ही, बैठ जाते जाम लेके,
कभी सन्नाटे मे दिल मे दफनाए हुए आरज़ू के संग,
तो कभी बेजुबान आंखों मे दबी नमि के परछाईओं मे।

हम तो तुमपे जान निसार करते थे,
आधी ज़िंदगी ऐसे इंतज़ार मे गुज़र गई,
बस आंधी आने ही वाली थी,
और मिटने की वक्त चौखट पे खड़ी थी,
इतनी जल्दी भी क्या थी, 
जो तुम अपने हाथों को ख़ून से रंग ली।।




© शशीकांत मॅहान्ती



No comments:

Post a Comment